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लखनऊ में कस्टम ऐप डेवलपमेंट — आपके काम के तरीके पर बना सॉफ़्टवेयर

कस्टम ऐप (Custom App) वह सॉफ़्टवेयर है जो किसी एक बिज़नेस के अपने काम के तरीके पर बनता है — क्लिनिक की बुकिंग, डीलरों के ऑर्डर या कोचिंग की फ़ीस — कोई तैयार सॉफ़्टवेयर नहीं जिसके हिसाब से आपको ढलना पड़े।

ज़रूरी जानकारी

रूप
वेब ऐप, या ज़रूरत हो तो मोबाइल ऐप
तैयार
सारी फ़ीडबैक मिलने के 15–20 दिन में
क्रम
प्लान, फ़ीडबैक, बिल्ड, टेस्ट, हैंडओवर
मालिकाना
डेटा और कोड आपके नाम
कीमत
WhatsApp पर कोटेशन

विकास नगर, लखनऊ का हमारा स्टूडियो इन्हें ब्राउज़र में खुलने वाले वेब ऐप के रूप में, या जहाँ ठीक बैठे वहाँ मोबाइल ऐप के रूप में बनाता है। हर स्क्रीन का प्लान पहले बनता है, और सारी फ़ीडबैक मिलने के 15–20 दिन में ऐप तैयार होता है।

ऐप बनाना हमारे स्टूडियो की नई सेवा का हिस्सा है। वही डिज़ाइन टीम, जो 2,500+ कंपनियों की डायरी, कैलेंडर और स्टेशनरी बनाती है, अब उनके रोज़ के काम के छोटे टूल भी प्लान और कोड करती है। कीमत WhatsApp पर कोटेशन से तय होती है। अंग्रेज़ी में: English पेज।

कस्टम ऐप क्या होता है?

लखनऊ का हर बिज़नेस किसी न किसी “सॉफ़्टवेयर” पर पहले से चल रहा है — काउंटर का रजिस्टर, मुनीम जी की एक्सेल शीट, या वह WhatsApp ग्रुप जिसमें डीलर ऑर्डर डालते हैं और कोई उन्हें बिल में दोबारा टाइप करता है। कारोबार बढ़ते ही यही रजिस्टर अड़चन बन जाता है।

कस्टम ऐप उस रजिस्टर की जगह लॉगिन वाली स्क्रीन रखता है — उन्हीं कॉलम के साथ जो आप सच में भरते हैं, ऐसी जाँचों के साथ जो रजिस्टर में कभी नहीं थीं, और अपने-आप तैयार रिपोर्ट के साथ। तैयार सॉफ़्टवेयर हज़ारों बिज़नेस के औसत के लिए बनता है; कस्टम ऐप आपके नियम मानता है। डीलर कार्टन में ऑर्डर देते हैं पर स्टॉक पीस में गिना जाता है, तो ऐप ख़ुद बदल देता है।

यहाँ बात बड़े ERP सिस्टम की नहीं, एक बार-बार की परेशानी हटाने वाले टूल की है। हमारे अपने प्रिंट क्लाइंट भी RX Design Hub के क्लाइंट ऐप में अपने ऑर्डर का चरण देख लेते हैं, फ़ोन किए बिना — कस्टम ऐप इसी आकार की समस्या के लिए होता है।

दस तरह के ऐप, और हर एक कौन-सी परेशानी हटाता है

ज़्यादातर ब्रीफ़ इनमें से किसी एक में आते हैं; कई बार दो जुड़कर — जैसे बुकिंग और मालिक का डैशबोर्ड — एक ही ऐप बनते हैं।

लखनऊ के बिज़नेस के लिए आम कस्टम ऐप, वह परेशानी जो हटती है, और किसे चाहिए
ऐपकौन-सी परेशानी हटती हैआम तौर पर किसे चाहिए
बुकिंग और अपॉइंटमेंटसुबह फ़ोन व्यस्त, एक समय पर दो बुकिंग। ऐप खाली स्लॉट दिखाता है और पुष्टि भेजता है।क्लिनिक, सैलून, जिम, सर्विस सेंटर
डीलर ऑर्डरवॉयस नोट और पर्ची की फ़ोटो, ऑफ़िस में दोबारा टाइपिंग। हर डीलर का लॉगिन, रेट-लिस्ट और पिछले ऑर्डर।निर्माता, डिस्ट्रीब्यूटर, थोक व्यापारी
स्टॉक रजिस्टरगिनती कॉपी में, कमी ऑडिट के दिन पता चलती है। आवक-जावक दर्ज, कम स्टॉक पर अलर्ट।दुकानें, गोदाम, स्टॉकिस्ट
फ़ील्ड स्टाफ़ और हाज़िरीहाज़िरी भरोसे पर, विज़िट रिपोर्ट हफ़्ते भर बाद। लोकेशन के साथ चेक-इन, नोट और फ़ोटो।सेल्स टीम, सर्विस इंजीनियर, NGO
मालिक का डैशबोर्डआज की बिक्री पर तीन लोगों से तीन जवाब। एक डेटा, एक स्क्रीन।कई शाखाओं या टीमों वाले बिज़नेस
लीड सूची (CRM जैसा)पूछताछ WhatsApp, कॉल और डायरी में बिखरी। हर लीड का चरण, अगला काम और ज़िम्मेदार।बिल्डर, संस्थान, एजेंसी
बिलिंग और कोटेशनहर बार नया कोटेशन, जोड़ और GST में चूक। रेट-लिस्ट से कोटेशन, मंज़ूरी पर उसी से बिल।इवेंट प्लानर, ठेकेदार, व्यापारी
फ़ीस और मेंबरशिपबकाया जानने के लिए रजिस्टर पलटना। किसने दी, किसकी बाकी — याद-दिहानी समय पर।जिम, कोचिंग, क्लब, सोसाइटी
छात्र और अभिभावककागज़ी नोटिस घर नहीं पहुँचते। अभिभावक को बच्चे की हाज़िरी, होमवर्क और फ़ीस एक जगह।स्कूल, कोचिंग, हॉस्टल
डिलीवरी और डिस्पैचग्राहक बार-बार पूछता है माल कहाँ है। स्टाफ़ चरण बदलता है, ग्राहक ख़ुद देखता है।डिस्ट्रीब्यूटर, कैटरर, पैकेजिंग यूनिट

वेब ऐप या मोबाइल ऐप — फ़र्क़ आसान भाषा में

वेब ऐप ब्राउज़र में खुलता है — फ़ोन, टैबलेट या दफ़्तर के कंप्यूटर पर — और लॉगिन के पीछे रहता है। कुछ इंस्टॉल नहीं करना पड़ता: स्टाफ़ को लिंक और पासवर्ड भेजिए, बस। रजिस्टर, डैशबोर्ड, ऑर्डर फ़ॉर्म और कोटेशन जैसे दफ़्तरी कामों के लिए ज़्यादातर यही सही रहता है।

मोबाइल ऐप फ़ोन में इंस्टॉल होता है। यह वहाँ काम आता है जहाँ फ़ोन की अपनी सुविधाएँ ज़रूरी हों — विज़िट के साथ लोकेशन दर्ज होना, कैमरे की फ़ोटो सीधे रिकॉर्ड में जाना, या ऐसा नोटिफ़िकेशन जो ऐप खोले बिना पहुँचे।

कई बार एक प्रोजेक्ट से दोनों बनते हैं: दफ़्तर के लिए वेब ऐप, सड़क पर रहने वाले स्टाफ़ के लिए सादा मोबाइल ऐप। कौन-सा रूप सही है, यह हम आपका काम सुनकर बताते हैं; जहाँ अकेला वेब ऐप काफ़ी हो, वहाँ वही।

ऐप कैसे बनता है: प्लान, फ़ीडबैक, बिल्ड, टेस्ट, हैंडओवर

15–20 दिन की गिनती तब शुरू होती है जब प्लान पर आपकी सारी फ़ीडबैक आ जाए; ऐप ठीक बनेगा या नहीं, यह प्लान में ही तय हो जाता है।

  1. ज़रूरत के नोट्स

    WhatsApp पर बातचीत या आपके दफ़्तर में मुलाक़ात। आज काम कैसे चलता है और कहाँ अटकता है, यह लिखा जाता है; आप उसे सुधारते हैं।

  2. स्क्रीन-दर-स्क्रीन प्लान

    हर स्क्रीन का सादा खाका (वायरफ़्रेम): स्टाफ़ क्या देखेगा, क्या भरेगा, मालिक की रिपोर्ट में क्या आएगा। प्लान तय होने से पहले कोडिंग नहीं।

  3. आपकी फ़ीडबैक

    आप और ऐप चलाने वाले लोग बताते हैं कि क्या छूटा और क्या फ़ालतू है। यह पूरी होते ही 15–20 दिन शुरू।

  4. बिल्ड

    प्लान के मुताबिक़ स्क्रीन कोड होती हैं, लॉगिन और रोल के साथ; बनता हुआ ऐप आप प्राइवेट लिंक पर देखते रहते हैं।

  5. असली डेटा पर टेस्ट

    पिछले हफ़्ते के ऑर्डर या एक महीने की फ़ीस डालकर ऐप वैसे चलाया जाता है जैसे स्टाफ़ चलाएगा। यहाँ के सुधार बिल्ड का ही हिस्सा हैं।

  6. हैंडओवर और ट्रेनिंग

    एक्सेस, कोड और डेटा आपको सौंपे जाते हैं, और WhatsApp या वीडियो कॉल पर छोटी ट्रेनिंग होती है।

पहली बातचीत से पहले क्या तैयार रखें

ऐप का ब्रीफ़ तकनीक के बारे में कम, आपके काम के बारे में ज़्यादा होता है।

  • काम का क्रम सादी भाषा में: एक ऑर्डर, बुकिंग या एडमिशन शुरू से ख़त्म होने तक किन हाथों से गुज़रता है
  • अभी चल रहे रजिस्टर और एक्सेल शीट — भरे हुए एक पन्ने की फ़ोटो काफ़ी है, कॉलम से फ़ील्ड पता चल जाते हैं
  • कौन लॉगिन करेगा — मालिक, मैनेजर, काउंटर स्टाफ़, फ़ील्ड स्टाफ़, डीलर, अभिभावक या ग्राहक — और किसे क्या दिखे
  • दिन, हफ़्ते या महीने के आख़िर में कौन-सी रिपोर्ट चाहिए
  • ऐप से निकलने वाले कागज़ — रसीद, चालान, कोटेशन — अभी के फ़ॉर्मैट का एक नमूना
  • वे नियम जिनमें अक्सर चूक होती है: उधार की सीमा, डिस्काउंट की हद, किसकी मंज़ूरी ज़रूरी
  • बटन और लेबल हिंदी में चाहिए, अंग्रेज़ी में या दोनों में

कोई हिस्सा अभी तय नहीं है तो बता दीजिए; प्लान का चरण इसी के लिए है। लखनऊ में हम आपकी जगह पर बैठकर काम होते हुए भी देख सकते हैं।

डेटा और कोड आपका

सॉफ़्टवेयर बनवाने से पहले दो सवाल सबसे अहम हैं: डेटा किसका है, और डेवलपर कल न मिले तो क्या होगा। हमारा जवाब दोनों के लिए एक है। ऐप में जमा होने वाला डेटा — ग्राहक, ऑर्डर, फ़ीस, स्टॉक — आपका है और आपके नाम वाले अकाउंट में रहता है। ऐप का कोड प्रोजेक्ट के अंत में नोट्स के साथ आपको सौंपा जाता है, ताकि आगे आप जिस भी डेवलपर को चुनें, वह उसे पढ़कर काम बढ़ा सके।

होस्टिंग और डोमेन भी आपके नाम पर ख़रीदे जाते हैं, ठीक वैसे ही जैसे हमारी वेबसाइटों में।

एक उदाहरण: कोचिंग संस्थान का फ़ीस और हाज़िरी ऐप

यह एक उदाहरण ब्रीफ़ है, किसी क्लाइंट का केस स्टडी नहीं। मान लीजिए अलीगंज और इंदिरा नगर में दो शाखाओं वाला एक कोचिंग संस्थान है, जिसमें लगभग 400 छात्र हैं। फ़ीस किस्तों में आती है और हर शाखा का अपना रजिस्टर है। महीने की 10 तारीख़ को काउंटर स्टाफ़ आधा दिन बकाया किस्तें ढूँढने में लगाता है, और मालिक को दोनों शाखाओं का जोड़ शाम तक फ़ोन पर मिलता है।

प्लान में काउंटर के लिए तीन स्क्रीन हैं (नया एडमिशन, फ़ीस रसीद, बकाया सूची), शिक्षकों के लिए एक (बैच-वार हाज़िरी) और मालिक के लिए एक डैशबोर्ड (शाखा-वार वसूली)। काउंटर स्टाफ़ की फ़ीडबैक में एक बात जुड़ती है जिसका किसी ने ज़िक्र नहीं किया था — एक ही परिवार के दो बच्चों पर मिलने वाली छूट। फ़ीडबैक पूरी होने के बाद बिल्ड और पिछले दो महीनों की असली फ़ीस एंट्री पर टेस्ट में वही 15–20 दिन लगते हैं, फिर वीडियो कॉल पर ट्रेनिंग। ऐसे संस्थानों की वेबसाइट की बात कोचिंग संस्थानों वाले पेज पर है।

लखनऊ में प्लान, कहीं से भी इस्तेमाल

ऐप का काम अक्सर आपकी मेज़ पर बातचीत से शुरू होता है। हम सेक्टर 3, विकास नगर में हैं (सुबह 10 से शाम 6:30, शुक्रवार बंद) और लखनऊ में कहीं भी मुलाक़ात तय हो सकती है; नक्शा संपर्क पेज पर है। कानपुर, बाराबंकी, अयोध्या या दूर के शहरों का काम WhatsApp, कॉल और स्क्रीन-शेयर पर उन्हीं कदमों से चलता है।

वेबसाइट और ऐप साथ में बनें तो दोनों एक डिज़ाइन और एक डेटा पर चलते हैं। जो टीम ऐप की रसीद डिज़ाइन करती है, वही आपकी बिल बुक और स्टेशनरी भी बनाती है, इसलिए स्क्रीन वाली और काउंटर वाली रसीद पर एक ही लोगो रहता है। सेक्टर के हिसाब से ऐप कहाँ काम आता है, यह क्लिनिक, डीलर और दुकानों के पेजों पर है। स्टूडियो के बारे में: शुभम कुमार।

ऐप बनवाने से पहले लखनऊ के बिज़नेस क्या पूछते हैं

कस्टम ऐप और तैयार सॉफ़्टवेयर में क्या फ़र्क़ है?

तैयार सॉफ़्टवेयर औसत बिज़नेस के लिए बनता है और आपको उसके हिसाब से ढलना पड़ता है। कस्टम ऐप आपके काम के नोट्स से प्लान होता है, उसमें सिर्फ़ ज़रूरी स्क्रीन होती हैं, और कोड व डेटा आपके रहते हैं।

ऐप बनने में कितना समय लगता है?

स्क्रीन-दर-स्क्रीन प्लान पर आपकी सारी फ़ीडबैक मिलने के बाद 15–20 दिन। उससे पहले का समय इस पर निर्भर है कि आपकी टीम नोट्स और प्लान कितनी जल्दी पढ़कर सुधारती है।

मोबाइल ऐप चाहिए या वेब ऐप से काम चल जाएगा?

दफ़्तर के रजिस्टर, डैशबोर्ड और ऑर्डर फ़ॉर्म के लिए वेब ऐप काफ़ी है; यह किसी भी फ़ोन के ब्राउज़र में बिना इंस्टॉल के खुलता है। कैमरा, लोकेशन या नोटिफ़िकेशन चाहिए तो मोबाइल ऐप बेहतर है।

ऐप की कीमत कैसे तय होती है?

कोई रेट-लिस्ट नहीं है। कीमत स्क्रीन की संख्या, लॉगिन करने वाले रोल, रिपोर्ट और दूसरे सिस्टम से जुड़ाव पर निर्भर है। काम के नोट्स और रजिस्टर की एक फ़ोटो WhatsApp पर भेजिए, लिखित कोटेशन वहीं आएगा।

क्या ऐप पूरी तरह हिंदी में बन सकता है?

हाँ। बटन, लेबल और संदेश हिंदी, अंग्रेज़ी या दोनों में हो सकते हैं। रसीद और चालान जैसे प्रिंट भी हिंदी में निकल सकते हैं, ताकि काउंटर पर किसी को अनुवाद न करना पड़े।

हमारा स्टाफ़ तकनीकी नहीं है, क्या वे ऐप चला पाएँगे?

स्क्रीन उन्हीं कॉलम और शब्दों पर बनती हैं जो आपका स्टाफ़ रजिस्टर में पहले से इस्तेमाल करता है। प्लान पर फ़ीडबैक भी वही लोग देते हैं, और हैंडओवर पर ट्रेनिंग होती है।

In English

This is the Hindi page for custom app development in Lucknow. A custom app is software planned around one business's own process: bookings, dealer orders, stock, fees, field attendance or an owner's dashboard. RX Design Hub's Vikas Nagar studio builds these as browser-based web apps, or as mobile apps where the use calls for one. Every screen is planned first; after your feedback on that plan, the app is built, tested on your real records and handed over with training, ready 15–20 days after all feedback. The data and code belong to the client, and quotes are given on WhatsApp. English version: custom app development in Lucknow.

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विकास नगर, लखनऊ 226022

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