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लखनऊ की दुकानों, शोरूम और बुटीक के लिए वेबसाइट
दुकान की वेबसाइट असल में फ़ोन पर खुलने वाला शोकेस है: कैटेगरी-वार सामान, साफ़ फ़ोटो, दाम या ‘दाम पूछें’, हर प्रोडक्ट पर WhatsApp पर ऑर्डर करने का बटन, और दुकान का नक्शा व खुलने का समय। विकास नगर, लखनऊ का हमारा स्टूडियो ऐसी कैटलॉग वेबसाइटें बिना किसी टेम्पलेट के, कस्टम कोडिंग से बनाता है। फ़ोटो, प्रोडक्ट सूची और बाकी सारी जानकारी मिलने के 8–10 दिन में साइट लाइव होती है; कीमत WhatsApp पर कोटेशन से तय होती है।
हज़रतगंज के शोरूम, अमीनाबाद और चौक की कपड़े, चिकनकारी और सर्राफ़ा की दुकानें, अलीगंज और इंदिरा नगर भूतनाथ के बुटीक, गोमती नगर पत्रकारपुरम और आलमबाग के इलेक्ट्रॉनिक्स व फ़र्नीचर शोरूम — इन सबके ग्राहक अब दुकान आने से पहले फ़ोन पर देख लेते हैं। हर तरह की वेबसाइट की जानकारी वेबसाइट और ऐप पेज पर है; अंग्रेज़ी में यह पेज यहाँ है।
जिस दुकान पर पहले से भीड़ है, उसे वेबसाइट क्यों चाहिए?
अमीनाबाद या भूतनाथ की किसी चलती दुकान के मालिक का पहला सवाल यही होता है: ग्राहक तो रोज़ आते हैं, वेबसाइट किसलिए? जवाब ग्राहक के फ़ोन में है। आज ज़्यादातर लोग दुकान आने से पहले फ़ोन पर नया माल, दाम की रेंज और खुलने का समय देख लेते हैं। जो दुकान फ़ोन पर नहीं दिखती, उसकी जगह पास वाली दुकान का नाम आ जाता है।
ज़्यादातर दुकानें यह काम WhatsApp पर फ़ोटो भेजकर चलाती हैं। फ़ोटो चैट में दब जाती हैं, हर नए ग्राहक को फिर से भेजनी पड़ती हैं, और Google उन्हें कभी नहीं देखता। वेबसाइट वही कैटलॉग एक स्थायी लिंक पर रख देती है — जिसे आप स्टेटस पर लगा सकें, विज़िटिंग कार्ड पर छाप सकें, और जो “पास की दुकान” वाली खोज में भी आए।
दुकान की वेबसाइट में कौन-से पेज होने चाहिए
बहुत सारे पेज ज़रूरी नहीं; ये छह हिस्से ठीक बन जाएँ तो काफ़ी है। बड़े शोरूम में कैटेगरी ज़्यादा होती हैं, बुटीक में कम।
| पेज | क्या दिखाना है | दुकान के लिए क्यों ज़रूरी |
|---|---|---|
| होम (शोकेस) | दुकान का नाम, क्या बिकता है, इस हफ़्ते का नया माल, WhatsApp और कॉल बटन | पहली स्क्रीन पर ही समझ आ जाए कि यह साड़ी की दुकान है या मोबाइल की |
| कैटेगरी पेज | जैसे सूट, साड़ी, कुर्ती; या फ़्रिज, कूलर, टीवी — हर कैटेगरी की फ़ोटो-ग्रिड | ग्राहक सीधे अपने काम के हिस्से पर पहुँचे, पूरा कैटलॉग न पलटे |
| प्रोडक्ट पेज | बड़ी फ़ोटो, साइज़ या रंग, दाम या ‘दाम पूछें’, ‘WhatsApp पर ऑर्डर करें’ बटन | इसी पेज का लिंक ग्राहक आगे भेजता है, इसलिए यह अपने-आप में पूरा हो |
| त्योहार कलेक्शन | दिवाली, शादी का सीज़न, ईद, राखी — मौसम के हिसाब से अलग पेज | सीज़न से पहले लिंक तैयार हो, तो स्टेटस और ब्रॉडकास्ट उसी पर भेजे जा सकते हैं |
| डिलीवरी और भुगतान | किन इलाकों में डिलीवरी, कितने समय में, भुगतान के तरीके, बदलने-लौटाने का नियम | फ़ोन पर बार-बार पूछे जाने वाले सवाल एक पेज पर ख़त्म |
| पता और समय | Google Maps, पास का लैंडमार्क, खुलने-बंद होने का समय, साप्ताहिक बंदी | पुराने बाज़ारों में रास्ता बताना आधा काम है — लैंडमार्क से ग्राहक सीधा पहुँचे |
काउंटर के काम, वेबसाइट पर
ये वे चीज़ें हैं जो काउंटर पर रोज़ होती हैं; वेबसाइट पर बस उनका ऑनलाइन रूप चाहिए।
- दाम दिखाएँ या पूछताछ पर
- रोज़ के सामान पर दाम सीधे दिखाना ठीक रहता है; गहने, ब्राइडल या ऑर्डर पर बनने वाले सामान पर ‘दाम पूछें’ बटन। एक ही साइट पर दोनों तरीके अलग-अलग कैटेगरी में चल सकते हैं।
- ‘WhatsApp पर ऑर्डर करें’ बटन
- बटन दबाते ही आपका WhatsApp खुलता है, संदेश में प्रोडक्ट का नाम और कोड पहले से लिखा होता है।
- Google Maps और समय
- सही लोकेशन, समय और साप्ताहिक बंदी, ताकि कोई बंद शटर देखकर न लौटे।
- त्योहार कलेक्शन
- सीज़न का अलग पेज, जिसका एक लिंक स्टेटस, ब्रॉडकास्ट और पर्चे पर एक साथ चल सके।
- डिलीवरी एरिया
- किन इलाकों में डिलीवरी होती है — पूरा लखनऊ, या सिर्फ़ गोमती नगर और इंदिरा नगर — और किस शर्त पर, यह साफ़ लिखा हो।
- ऑनलाइन पेमेंट का विकल्प
- चाहें तो कार्ट और ऑनलाइन पेमेंट जुड़ सकता है; न चाहें तो ऑर्डर WhatsApp पर और भुगतान डिलीवरी या दुकान पर।
दुकान की वेबसाइट के लिए क्या भेजना है
8–10 दिन की गिनती तब शुरू होती है जब नीचे की चीज़ें पूरी हमारे पास आ जाएँ।
- फ़ोटो: हर प्रोडक्ट की साफ़ रोशनी में, सादे पीछे के साथ फ़ोटो; दुकान के बोर्ड और अंदर की दो-तीन फ़ोटो, ताकि ग्राहक पहचान सके।
- सूची: एक्सेल या कॉपी के पन्ने की फ़ोटो — कैटेगरी, प्रोडक्ट का नाम, कोड, साइज़ या रंग, और दाम (अगर दिखाने हैं)।
- GST और फ़र्म का विवरण: फ़र्म का नाम, GST नंबर (अगर साइट पर दिखाना हो), संपर्क व्यक्ति का नाम और नंबर।
- पता: पूरा पता, Google Maps की पिन, पास का लैंडमार्क, समय और साप्ताहिक बंदी का दिन।
- नियम: डिलीवरी के इलाके, बदलने-लौटाने का नियम और भुगतान के तरीके — एक-एक लाइन काफ़ी है।
- लोगो और सोशल लिंक: लोगो की फ़ाइल (न हो तो बिल बुक या बोर्ड की फ़ोटो) और Instagram या Facebook पेज के लिंक।
टेक्स्ट छोटा रखिए; दुकान की वेबसाइट पर फ़ोटो बोलती हैं। त्योहार के बैनर हमारी डिज़ाइन टीम बना देती है।
पहली बातचीत से वेबसाइट लाइव होने तक
दुकान के बारे में बातचीत
WhatsApp या कॉल पर: क्या बिकता है, कितनी कैटेगरी, दाम दिखाने हैं या नहीं, डिलीवरी करते हैं या नहीं। दुकान से मिलती-जुलती डेमो इसी समय भेज दी जाती है।
कोटेशन, फिर 50% एडवांस
WhatsApp पर लिखित कोटेशन; 50% एडवांस पर काम पक्का, बाकी साइट लाइव होने पर।
फ़ोटो और सूची
ऊपर की चेकलिस्ट वाली सामग्री। सब पूरा मिलते ही 8–10 दिन शुरू।
शोकेस पहले
आपके रंगों में होम पेज, प्राइवेट लिंक पर। एक राउंड बदलाव के बाद बाकी कैटलॉग उसी ढाँचे पर बनता है।
पूरा कैटलॉग, दो राउंड करेक्शन
सारे प्रोडक्ट, ऑर्डर बटन, नक्शा और ज़रूरत हो तो हिंदी-अंग्रेज़ी दोनों। अपने फ़ोन पर हर बटन दबाकर देखिए; दो राउंड करेक्शन शामिल हैं।
लॉन्च
आपके डोमेन पर SSL के साथ साइट लाइव, Google Business Profile और Search Console से जुड़ी, और लिंक स्टेटस पर लगाने के लिए तैयार।
दुकान के लिए ऐप कब काम आता है
ऑर्डर बढ़ने लगें तो पीछे का हिसाब भी सँभालना पड़ता है। दुकानों के लिए तीन तरह के ऐप सबसे काम के हैं:
- ऑर्डर-डिलीवरी ट्रैकर: WhatsApp पर आया हर ऑर्डर एक सूची में — पैक हुआ, निकला, पहुँचा। डिलीवरी वाला एक बार चरण बदले, काउंटर पर फ़ोन न आए।
- ग्राहक सूची और त्योहार संदेश: किसने क्या ख़रीदा, कब, किस इलाके से — ताकि दिवाली या शादी के सीज़न से पहले सही ग्राहकों की सूची निकले और उन्हें नया कलेक्शन भेजा जा सके।
- स्टॉक रजिस्टर: आवक, बिक्री और ख़त्म होते माल का अलर्ट, ताकि दोबारा मँगाने का समय पहले पता चले।
ये ज़्यादातर वेब ऐप होते हैं, जो दुकान के फ़ोन या कंप्यूटर के ब्राउज़र में खुलते हैं। हर स्क्रीन का प्लान पहले बनता है, और प्लान पर आपकी सारी फ़ीडबैक मिलने के 15–20 दिन में ऐप तैयार होता है। पूरी जानकारी: कस्टम ऐप डेवलपमेंट।
लखनऊ का ग्राहक दुकान कैसे खोजता है
दुकानों की खोज सबसे ज़्यादा लोकल होती है। लोग लिखते या बोलते हैं: “हज़रतगंज में घड़ी का शोरूम”, “चौक में चिकनकारी कुर्ता”, “भूतनाथ मार्केट बुटीक”, “पत्रकारपुरम में मोबाइल की दुकान”, “आलमबाग में सोफ़ा”। इनमें से बहुत-सी खोज हिंदी में होती है।
Google ऐसी खोज में नक्शे वाले नतीजे और वे पेज दिखाता है जिनमें बाज़ार का नाम, सामान और असली फ़ोटो हों। इसलिए हम बाज़ार और इलाके का नाम साफ़ लिखते हैं — जैसे “अमीनाबाद, लखनऊ” या “भूतनाथ मार्केट, इंदिरा नगर” — पता और समय स्ट्रक्चर्ड डेटा में डालते हैं, Google Business Profile से साइट जोड़ते हैं, और कैटेगरी के नाम उसी भाषा में रखते हैं जिसमें ग्राहक बोलता है: “लहंगा”, “सूट”, “कूलर”। हिंदी संस्करण हो तो वही पेज हिंदी खोज में भी आ सकते हैं।
हमारा स्टूडियो विकास नगर में है, और लखनऊ में किसी भी दुकान पर मुलाक़ात तय हो सकती है — दुकान का समय देखकर, भीड़ से पहले।
बिल बुक, थैले और वेबसाइट — एक ही डिज़ाइन टेबल से
दुकान की पहचान कई जगह छपती है: काउंटर की बिल बुक और ऑर्डर बुक, विज़िटिंग कार्ड और लेटरहेड जैसी स्टेशनरी, लोगो वाले जूट बैग, और साल की शुरुआत में ग्राहकों को दिए जाने वाले वॉल कैलेंडर। जब ये सब और वेबसाइट एक ही डिज़ाइन टेबल से निकलते हैं, तो रंग, लोगो और दुकान का नाम हर जगह एक जैसा रहता है। बिल बुक पर वेबसाइट का पता या QR कोड छप जाए, तो हर बिल ग्राहक को आपके कैटलॉग तक लौटाने का रास्ता बन जाता है।
दुकानदार वेबसाइट के बारे में क्या पूछते हैं
क्या हर प्रोडक्ट का दाम वेबसाइट पर डालना ज़रूरी है?
नहीं। रोज़ के सामान पर दाम दिखाने से पूछताछ कम होती है; गहने, ब्राइडल या ऑर्डर पर बनने वाले सामान पर ‘दाम पूछें’ बटन ठीक रहता है।
मेरा स्टॉक हर हफ़्ते बदलता है, तो वेबसाइट कैसे अपडेट होगी?
यह बात ब्रीफ़ में ही बताइए — कितनी बार और कितने प्रोडक्ट बदलते हैं, और बदलाव कौन करेगा। उसी हिसाब से वेबसाइट की बनावट और कोटेशन तय होते हैं।
क्या ऑनलाइन पेमेंट लेना ज़रूरी है?
नहीं। बहुत-सी दुकानें ऑर्डर WhatsApp पर लेती हैं और भुगतान डिलीवरी पर या दुकान पर। कार्ट और ऑनलाइन पेमेंट चाहिए तो वह जोड़ा जा सकता है; इसका असर कोटेशन पर पड़ता है।
मेरे पास प्रोफ़ेशनल फ़ोटो नहीं हैं, क्या फ़ोन की फ़ोटो चलेंगी?
दिन की रोशनी में, सादे पीछे के साथ ली गई फ़ोन की फ़ोटो से अच्छा कैटलॉग बन जाता है। फ़ोटो आपकी तरफ़ से आती हैं; हम उनका आकार ठीक करके हल्का करते हैं, ताकि पेज जल्दी खुले।
क्या वेबसाइट Google Maps पर मेरी दुकान से जुड़ जाएगी?
हाँ। लॉन्च पर वेबसाइट आपके Google Business Profile से जोड़ी जाती है, और पता, समय व लोकेशन स्ट्रक्चर्ड डेटा में डाले जाते हैं, ताकि नक्शे और वेबसाइट पर एक ही जानकारी दिखे।
त्योहार से पहले वेबसाइट चाहिए, कब शुरू करें?
फ़ोटो, सूची और पता पूरा मिलने के 8–10 दिन में साइट लाइव होती है, पर ज़्यादातर देरी फ़ोटो जुटाने में होती है। इसलिए फ़ोटो का काम पहले शुरू कीजिए, ताकि सीज़न से पहले ये 8–10 दिन बचे रहें।
In English
This Hindi page covers websites for shops, showrooms and boutiques in Lucknow, from Hazratganj, Aminabad and Chowk to Aliganj, Bhootnath in Indira Nagar, Patrakarpuram in Gomti Nagar and Alambagh. RX Design Hub custom-codes catalogue sites with categories, product photographs, prices or a price-on-request button, a WhatsApp order button, map and timings, festival collections, delivery areas and optional online payment. A site goes live 8–10 days after the photographs, product list, GST details and address arrive. Order trackers, customer lists and stock registers can be built as apps, ready 15–20 days after feedback. Quotes are given on WhatsApp. English version: websites for shops and boutiques.
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- वेबसाइट डेवलपमेंटकस्टम-कोडेड बिज़नेस वेबसाइट, 8–10 दिन में लाइव।

- कस्टम ऐप डेवलपमेंटआपके काम के तरीके पर बने वेब और मोबाइल ऐप।

- डीलर-डिस्ट्रीब्यूटर के लिए वेबसाइटब्रांड सूची, ऑर्डर फ़ॉर्म, रिटेलर जोड़ना।

- फ़ैक्ट्री-निर्माताओं के लिए वेबसाइटप्रोडक्ट कैटलॉग, क्षमता, डीलर पूछताछ।

- हम कैसे काम करते हैंब्रीफ़ से डिलीवरी तक, चरण दर चरण।

कोटेशन से पहले
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प्रोडक्ट, मात्रा, लोगो, पसंद का साइज़, बजट, डिलीवरी शहर और ज़रूरी तारीख साथ भेजें। छपाई से पहले नाम, रंग और अंतिम आर्टवर्क ध्यान से जाँचें।
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